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Saturday, 17 March 2018

दुर्गा के नौ रुपों में प्रथम शैलपुत्री


भक्ति। देवी दुर्गा के नौ रुपों में प्रथम शैलपुत्री है। नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा का नाम शैलपुत्री इसलिए पड़ा क्योंकि पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुईं। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना होती है। नवरात्र के प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है। इस संबंध में एक कथा प्रचलित है, यथा- एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया। इस यज्ञ में शंकरजी को उन्होंने निमंत्रित नहीं किया। 

सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन व्याकुल होने लगा। अपनी इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। समस्त बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा कि प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, किन्तु हमें नहीं बुलाया। कोई सूचना भी नहीं दी। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।' शंकरजी के उपदेश का सती पर कोई असर नहीं हुआ और अन्तत: भगवान शंकर ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर सत्कार तो दूर प्रेम से भी बातचीत नहीं कर रहा है। सभी लोग उनसे मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। 

बहनों ने भी व्यंग्यवाण और उपहास वाली ही बातें कीं। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो गया। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने स्वामी भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसीलिए वे 'शैलपुत्री' नाम से पहचानी गईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। 

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