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कर्मयोगी व युगपुरूष थे कुम्भाराम आर्य

आज ये क्षेत्र कुम्भाराम आर्य की बदौलत आबाद व खुशहाल है,यहां कुम्भाराम भागीरथ बनकर भाखड़ा नहर लाये थे। जिससें आज नोहर तहसील कृषी प्रधान तहसील मानी जा रही हैं।



- चौधरी कुम्भाराम आर्य का जन्म पटियाला राज्य के छोटा खैरा पुलिस स्टेशन ढूंढला में मई 1914 को हुआ था उनके पिता का नाम भैराराम सूंडा माता का नाम खिंवणी था। उनके पिता अपने पांचों भाईयों में बड़े थे। चौ.कुम्भाराम के सिर से पिता का साया 12 साल की उम्र में ही उठ गया। अत:उनकी माता उन्हें बीकानेर राज्य के सोदानपुरा में ले आई। वहां से कुछ दिनों के बाद उनकी माता उनको नोहर तहसील के गांव फेफाना में आ गई। ओर यहीं रहने लगे। इसी गांव में श्री आर्य का बाल्यकाल बीता  व शिक्षा प्राप्त की। इनके बचपन का नाम कुरड़ाराम था जो किन्ही अपरिहार्थ कारणवंश आगे चलकर स्कूल में भर्ती करवाते समय कुम्भाराम रखा गया। बाल्यकाल यहां बिताने व स्कूली पढ़ाई यही करने की वजह से इन्होंने एक प्रकार से फेफाना को अपनी जन्मभूमि मान्य की। श्री आर्य शिक्षाकाल में ही लगभग 13 साल की आयु में ही आर्य समाजी बन गये थे। गांव में आर्य समाज संस्था विद्वमान थी। उस समय आर्य समाज समाजिक क्रान्ति लाने वाली संस्था समझी जाती थी। देशी रियास्तों में आर्य समाजियों को स्वस्तन्त्रता सैनानी समझस जाता था। पुलिस उनकी की निगरानी रखती थी।
शिक्षा समाप्त करके कुम्भाराम ने जंगलात महकमें में हनुमानगढ़ में नौकरी की। उस समय उनकी आयु 14 साल थी। जब आर्य 1930 में कंाग्रेस का अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए लाहौर चले गये तो सरकार ने इनको नाबालिक होने का बहना लेकर 15 दिसम्बर 1931 को नौकरी से हटा दिया।  तब वे पुलिस विभाग में 27 जनवरी 1932 को लग यगे। पूर्ष ओर निष्ठा से कार्य करना शुरू कर दिया । नौकरी के दौरान राजनैतिक व्यक्तियों  मुक्ताप्रसाद वकील,रघुवरदयाल गोयल के संपर्क में कार्य करने लगे। राज्य सरकार ने आर्य को नजबंदी के लिए 14 दिसमबर 1946 को नोटिस जारी किया। इस प्रकार अक्टूबर के आस-पास कुम्भाराम आर्य पुलिस सेवा से अलग होकर राजनिती में कूद पड़े। बीकानेर राज्य में प्रजापरिषद स्थापित भी की गई। उसमें आर्य को मंत्रीमण्डल में लिया गया। यहां पी इन्होंने जागिरदारी प्रथा को समाप्त करने में पूर्ण भागीदारी निभाई। आर्य बीकानेर राज्य में 33 साल की आयु में प्रथम बार राजस्व मंत्री बने,अपने मंत्री कार्यकाल में भेंट ,बेगार,लागबाग ओर बांटा साहस ओर कुशलता से समाप्त किया। इसके अलावा भारत पाक के बंटवारे के समय पाकिसतान से आने वाले हर परिवार को बिना लिहाज के 25 बीघा सिंचित भूमि प्रदान की। कुम्भाराम किसानों के प्रतिनिधिथे। किसान वर्ग को उन्होंने अपना साहस पूर्ण व्यक्तित्व प्रदान किया। जिसमें बीकानेर राज्य प्रजा परिषद की सदस्य संख्या रघुवरदयाल गोयल के काय्र काल में केवल 40 के आस-पास थी। वहीं कुम्भाराम आर्य के परिवेश पच्चास हजार के ऊपर हो गई। आर्य का इक्याशी वर्ष का जीवन 1914-1995 संघर्षमय रहा। वे किसानों के हितों के लिए सदैव निर्भीकता से संसद में ओर संसद से बहार जोर से आवाज उठाते थे। उन्होंने गांव की गरीबी,अभाव,पिछड़ापन्रअशिक्षा,अंधविश्वास एवं कुरितियों को निकट से देखा।
इसके बाद किसानों की लड़ाई के लिए कूद पड़े। निरंकुश राठौडी सरकार से मुकाबला जान जोखिम से काम था। चौ.मौलिक चिन्तक थे। हर बात उनके तर्क आकाटय होते थे। अपने मंत्रीमण्डल काल में चौ.ने अनके जन-हितार्थ कार्य किये। जिनमें किसानों को खातेदारी का हक मिला,मुआवजा दिलाये,जो इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिख गया। किसानों के हित में लड़ते-लड़ते ,पांच दशकों तक संघर्षो से झूझते,तूफानों से लड़ते ,जुझारू सेनानी चौ.कुम्भाराम आर्य ने 26 अक्टूबर 1995 को जीवन की चादर उतार दी। निर्मल ओद बेदाग। यह निराला कर्मयोगी जिस शान से जिया ,उसी शान स मरा। वे देह के बंधन से मुक्त होकर विदेह हो गय। कुम्भाराम आर्य का नाम उनके कर्मो से अमर हो गया। ऐसे महान पुरूष को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। मई माह में हर साल गांव फेफाना में उनकी याद में श्रंदाजलि सभा होती हैं।


   
 पत्रकार जयलाल वर्मा चारणवासी(नोहर)

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