नेशनल। एक बार फिर 349 फिक्स डोज कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं पर तलवार लटक गई है। माना जा रहा है कि इन्हें एक बार फिर बाजार से बाहर किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने इनकी जांच के लिए एक कमिटी का गठन कर दिया है।
भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने अब दवाओं के मामले में देश की शीर्ष तकनीकी संस्था ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड के तहत एक कमिटी का गठन किया है। यह समिति अब इन दवाओं की वैज्ञानिकता और सेफ्टी का अध्ययन करने के साथ ही इस मामले में दवा कंपनियों और अन्य पक्षों की बात सुनेगी।
सरकार ने 2016 में इन दवाओं को अवैज्ञानिक और सेहत के लिए खतरनाक मानते हुए इन पर बैन लगाया था। इस बैन के खिलाफ कई नामी दवा कंपनियां सुप्रीम कोर्ट में चली गई थीं। कोर्ट ने बैन को गलत मानते हुए इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पुनर्विचार याचिका दायर करने पर अदालत ने सरकार से इन दवाओं की जांच करने के लिए एक कमिटी गठित करने को कहा था।
कारोबार
सरकार ने जिन 349 एफडीसी पर बैन लगाया था, उनका देश के संगठित दवा क्षेत्र में कुल कारोबार करीब 4000 करोड़ रुपये का है।
नुकसान
हेल्थ वर्कर्स ने इन्हें अवैज्ञानिक और सेहत के लिए खासा खतरनाक बताया है। एक से ज्यादा एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल से देश में बैक्टीरिया और वायरस के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ रहा है। दवाएं अपना काम करने में नाकाम होती जा रही हैं।
देशों में बैन
अमेरिका, जापान, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ ही कई देशों में एफडीसी पर रोक है।
एफडीसी
ये वह दवाएं हैं जो एक से ज्यादा दवाओं को मिलाकर बनाई हैं। मिसाल के लिए पैरासिटामॉल और एस्पिरिन दो अलग-अलग दवाएं हैं। इन्हें मिलाकर अगर कोई नई दवा बनाई जाती है तो उसे एफडीसी कहा जाएगा। देश में इस समय 7000 एफडीसी दवाएं बिक रही हैं।

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