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Thursday, 24 January 2019

गणतंत्र दिवस 2019:- मुद्रा - कृषि , विषय - किसान - बईमान


आजकल विधानसभा चुनाव के बाद या दिसंबर माह में चौपाल , चाय की थड़ी , दुकानों , आफिसों बाजार में एक शब्द का इस्तेमाल हो रहा है डिफाल्टर , जिसके शाब्दिक अर्थ के लिए  अलग-अलग उल्लेख सामने आ रहे हैं , सरकारी तंत्र या बैंक की डिक्शनरी में इसे डिफाल्टर , पार्टीयों व राजनीतिक योद्धाओं ने इस शब्द को ' चोर ' नाम से नवाजा है , आम और व्यापारिक शब्द ' बईमान ' चलन में आ गया । 



वास्तविक गहराई व समझ परे इस नाम से चटकारे लगाए जा रहे हैं हर जगह सब पूछ रहे हैं ' थे डिफाल्टर हो के ' अब इस शब्द की टीस उस मार्मिकता को दिखाती है अगर कोई उसे देखना और समझना चाहे तो क्योंकी जिस किसान हर प्रकार के मौसम में सर्दी , गर्मी , बरसात , लू , माइनस डिग्री की सर्द रात को अपनी खेती व शरीर बचाकर देश के अन्न धन के भण्डार में अपना प्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया आज उसके द्वारा खेत व पेट पालने के लिया गया कर्ज राक्षस रूपि रूपी रूप धारण कर राजनीति के महाभारत में फुटबॉल बना कर खेला जा रहा है 



 महान चिंतक , समाज रक्षक , उच्चविचारों के विद्वान सब मूक दर्शक बने हैं व आलोचक मजे से चटकारे ले रहें , पर्दे के पीछे किसान अपने परिवार के भरण-पोषण , बच्चों की आवश्यकताओं , पढ़ाई-लिखाई फीस आधुनिक साज सज्जा , मां बाप की बिमारियों का खर्च , पशुधन पर खर्च , सामाजिक परम्पराओं के इज्ज़त दार निर्वहन का खर्च , खेती किसानी के लिए भारी भरकम खर्च , अपने लिए एक छत के लिए जिद्दोजहद , आदी परम्पराओं का निर्वहन करके , देश की 75% आबादी कृषि पर निर्भरता , व सबका पेट पालकर अन्नदाता कहलाने वाले को एक नये मैडल , डिफाल्टर , चोर , बईमान से नवाजा जा रहा है , आजादी के बाद आधुनिकता कि होड़ , सुख सुविधाओं , के लिए भागम भाग व खेती पर अंधाधुंध खर्च , अधिक उत्पादन की महत्वकांक्षा के चलते , सरकारों , महान चिंतकों , समितियों आयोगों की कछुआ चाल से व कुठाराघात वाली नितियों के चलते कर्जदार होना मजबुरी है न की शौंक रोटी कपड़ा और मकान , मां बाप की सेवा , सामाजिक दायित्व भात , खर्च , पढ़ाई-लिखाई बच्चों की , रहने के लिए मकान , खेती के संसाधन , मंहगे खाद , बीज , किटनाशक , फसलों की बिमारियों पर खर्च , कभी कभी खाद , बीज , किटनाशक की भारी किल्लत में भी मंहगी खरीद , फसल बेचान में अयवस्था , भावांतर  , भूगतान आदी विकटकारी व्यवस्था के चलते किसान की हालात दयनीय है अतः इस मार्मिक रुप को देखने के बाद मेरी जगत के रखवाले ईश्वर से प्रार्थना " अन्नदाता सुखी भवेत् "



लेखक परिचय
लेखक:-अनिल तिवाड़ी

अनिल तिवाड़ी,एम ए संस्कृत, बीएड संस्कृत

वार्ड नंबर 5 नजदीक ठाकुर जी मन्दिर पक्कासारना हनुमानगढ़ 335512

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