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Monday, 8 May 2017

लोकप्रिय उपन्यास संरक्षण की एक पहल । Report Exclusive


साहित्य समाज का एक अंग है। एक ऐसा अंग जो समाज को प्रेरणा भी देता है और दर्पण भी दिखाता है। कोई भी सभ्य समाज बिना साहित्य के अपनी सभ्यता या संस्कृति को सुरक्षित नहीं रख सकता, उसका प्रचार-प्रसार नहीं कर सकता।
     हिंदी साहित्य की कई विधाएँ हैं। उनमें से एक है उपन्यास।  उपन्यास जगत को मुख्यतः दो रूप में विभक्त किया जाता है। एक है साहित्यिक रूप जिसमें प्रेमचंद, जैनेन्द्र, रेणू, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर आज तक बहुत  से विद्वान है। दूसरी तरफ है वह असाहित्यिक उपन्यास जिसकी परम्परा गोपालराम गहमरी, देवकीनंदन खत्री आदि ने रखी।

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   हम चर्चा कर रहें है असाहित्यिक उपन्यासों की। इन असाहित्यिक उपन्यासों की नीव गोपालराम गहमरी ने रखी और जिसे मजबूती प्रदान की देवकीनंदन खत्री ने। ये उपन्यास साहित्यिक उपन्यासों से इस दृष्टि से अलग थे की इनमें समाज के लिए कोई प्रेरणा न थी। इनमें था मात्र शुद्ध मनोरंजन। ऐसा मनोरंजन जिसमें आमजन इस कदर डूब जाता था की वह स्वयं को ही भूल बैठता था। सामान्यजन अपनी भाग-दौङ की जिंदगी से अलग कुछ पल राहत व मनोरंजन के चाहता है और यह मनोरंजन इन उपन्यासों में खूब होता था।

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    ओमप्रकाश शर्मा, परशुराम शर्मा, गुलशन नंदा, रानू, इब्ने सफी,  वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, केशव पण्डित, शैलेन्द्र तिवारी, टाइगर, विनय प्रभाकर, मनोज जैसे असंख्य नाम कभी इस उपन्यास जगत में सक्रिय थे।
   एक वह भी दौर था जब रेल्वे स्टेशन, बस स्टैण्ड और किताबों की दुकानों पर उपन्यास खूब बिका करते थे। सन् 1950 से लेकर सन् 1990 तक उपन्यास जगत का एक सुनहरा दौर था। एक ऐसा दौर जिसमें ये लोकप्रिय उपन्यास ब्लैक में भी बिके और रिकार्ड तोङ बिके।
  समय बदला और मनोरंजन के साधन बदल गये। अब सामान्यजन किताबों की दुनिया से दूर होकर टीवी. व इंटरनेट की दुनियां में चला गया। किताबों के पाठक कम हो गये और इसी के साथ लोकप्रिय उपन्यास भी गुमनामी के अंधेरे में खोता चला गया।
कभी इलाहाबाद, दिल्ली और मेरठ में उपन्यास प्रकाशन की बहुत सी संस्थाएं थी लेकिन आज अधिकतर बंद हो गयी।

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    आज न वो प्रकाशन संस्थाएं बची, न वो लेखक रहे और न ही वो उपन्यास।
 उपन्यास जगत की  एक बङी त्रासदी तो यह भी है की इंटरनेट के इस युग में भी इंटरनेट पर चंद उपन्यासकारों को छोङकर अन्य लेखकों की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
   इसी कमी को पूरा करने का जिम्मा लिया राजस्थान के एक छोटे से गांव बगीचा के गुरप्रीत सिंह ने।
        हिंदी साहित्य से Bed., NET, JRF और हाल ही में व्याख्याता पद हेतु चयनित गुरप्रीत सिंह की  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी- कविता आदि प्रकाशित हो चुकी हैं।
      अब इन्होंने अपने लेखन से दूर होकर गुमनामी के अंधेरे में खोते जा रहे उपन्यास जगत के संरक्षण के लिए जो पहल की है वह प्रशंसनीय कार्य है।

यह उपन्यास जगत जितना विशाल था उतना ही बिखरा हुआ भी। इस इन प्रकाशन संस्थाओं और लेखकों के पास भी उपनी उपन्यासों की कोई व्यवस्थित सूचना नहीं है।
      गुमनामी के अंधेरे में खो गये उन लेखकों को खोजना भी स्वयं में एक चुनौती है। वह भी तक, जब की उन उपन्यासों में लेखकों का कोई संपर्क सूत्र तक उपलब्ध नहीं है। उसमें से भी क ई छद्म लेखक (Ghost Writer) थे।
    अगर मनुष्य दृढ़ निश्चय कर ले तो सफलता अवश्य मिलती है।
  गुरप्रीत सिंह जी ने बताया की उन्होंने कई ऐसे लेखकों का पता लगाया जिन्हें लोग मरा हुआ मान चुके, कई  ऐसे लेखकों को भी ढूंढ निकाला जो उपन्यास जगत से दूर अब अलग दुनिया में व्यस्त थे।
      अगर कोई पाठक इन खो रहे उपन्यासों के संरक्षण हेतु साथ आना चाहता है तो वह इनसे संपर्क कर सकता है।
 - गुरप्रीत सिंह
श्री गंगानगर, राजस्थान।
Mob- 9509583944
Email- sahityadesh.blogspot.in
Site- www.sahityadesh.blogspot.in

1 comment:

  1. रिपोर्ट एक्सक्लूसिव का हार्दिक आभार जिन्होंने इस मुहिम में मेरा साथ दिया।
    धन्यवाद ।
    www.sahityadesh.blogspot.in

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