दोस्ती का अटूट बंधन: एसआई दिनेश और राधे की मार्मिक मुलाकात

दोस्ती का अटूट बंधन: एसआई दिनेश और राधे की मार्मिक मुलाकात
एसआई दिनेश कुमार और राधे की दोस्ती आज भी कायम (फोटो रातानाडा जोधपुर की)



कुलदीप शर्मा, जर्नलिस्ट ✍️

नाम था एसआई दिनेश कुमार का। उनके पिता खेतीबाड़ी करते थे, माता गृहिणी। जीवन की सीढ़ियां चढ़ने का सफर 2013 में कांस्टेबल बनकर शुरू हुआ, लेकिन महत्वाकांक्षा ने रुकने न दिया। लगातार तैयारी जारी रखी और 2021 बैच में सब-इंस्पेक्टर बन गए। वर्तमान में जोधपुर के नागौरी गेट थाने में ड्यूटी देते हैं वे, कानून का पहरा संभालते हुए।

पर इस कठोर वर्दी के पीछे छिपी है एक कोमल याद—बचपन की वो चार साल की दोस्ती, जो पहली कक्षा से चौथी तक रातानाडा, जोधपुर के स्कूल में परवान चढ़ी। राधे था उनका साथी, क्लास का वो दोस्त जिससे दिनेश को खासा प्रेम था। एक ही बेंच पर बैठे, एक ही सपनों के पीछे भागे, नादानियां साझा कीं। लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही रास्ते अलग हो गए—दिनेश ने महत्वाकांक्षाओं का पीछा किया, राधे जीवन ने थाम लिया।

फिर आया वो शनिवार। वर्षों बाद एसआई दिनेश कुमार स्कूल के पुराने दोस्त राधे से मिलने रातानाडा पहुंचे। राधे वहीं थे, रास्ते किनारे अपनी छोटी-सी दुकान पर। मोची का पुस्तैनी पेशा संभालते, चमड़े के टुकड़ों से जूते सीते। पिता के अचानक देहांत ने कंधों पर परिवार का पूरा बोझ लाद दिया था। पढ़ाई अधर में लटक गई, सपने टूट गए, लेकिन जिम्मेदारी ने हौसला दिया। राधे ने पिता की जगह संभाली—मां का सहारा बने, भाई-बहनों के भविष्य की नींव रखी। रोज सुबह उठकर सुई-चम्मच थामते, पसीना बहाते, घर का चूल्हा जलाते। जीवन की मार ने चेहरे पर झुर्रियां उकेरीं, लेकिन आंखों में वही बचपन की चमक बाकी थी।

मुलाकात का पल जैसे समय ठहर गया। वर्षों का फासला मिटते ही आंखों में आंसू छलक पड़े। गले लगे दोनों, अपनापन लौट आया। "राधे, तूने तो कमाल कर दिया," बोले दिनेश, वर्दी की चमक भूलकर पुराने दिन याद करते। राधे मुस्कुराए, "दिनेश भाई, जिम्मेदारी ने सिखाया जीना। तू तो ऊंचाइयों पर पहुंच गया।" बातें हुईं—स्कूल की शरारतों की, अलग होने की उदासी की, जीवन की लड़ाई की। दोस्ती में कोई भेदभाव न था; न वर्दी का, न पेशे का। 21वीं सदी के इस दौर में भी, जहां रिश्ते दिखावे के हो गए हैं, ये बंधन अटूट साबित हुआ। हंसे खूब, गले मिले, यादें ताजा कीं।

फिर वक्त ने बुलाया। एसआई दिनेश को ड्यूटी पर लौटना था। आखिरी नजरों से विदा लिया, वादा किया फिर मिलने का। बिछड़ गए दोबारा, लेकिन दिल में वो अपनापन हमेशा जिंदा रहेगा। ये कहानी बताती है—दोस्ती रूहानी रिश्ता है, जो जिम्मेदारियों के पहाड़ तोड़ देती है। राधे की मेहनत और दिनेश का संघर्ष, दोनों ही प्रेरणा हैं।


(लेखक एक पत्रकार हैं)



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