अब और किसी मां का बेटा जान न गंवाए, महिला दिवस के ठीक पहले ख़ास-पेशकस

अबला जीवन हाय तुहारी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखों में पानी..............

नारी सदियों से पूजनीय है रामायण में भी सीता ने नारी होने के कर्तव्य का निर्वहन किया था। महिला जनक जननी ही नहीं,साक्षात शक्ति स्वरूपा भी हैं। परिस्थिति कैसी भी हो,नारी प्रेम,करूणा से सब कुछ हासिल कर सकती हैं। चाहे अपना हो या पराया। आज महिला दिवस पर ऐसी ही दो महिलाओं के साहस किस्सों पर प्रस्तुत है संवाददाता जयलाल वर्मा की रिपोर्ट

चारणवासी। अगर किसी मां-बाप का इकलौता बेटा चला जाये तो उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता हैं। साथ ही मां का धोर्य खो जाता हैं। लेकिन गांव फेफाना की एक महिला ने अपने बेटे को खोने के बाद भी धोर्य को कायम रखा हैं। अब अन्य बेटों को बचाने के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर चुकी हैं। फेफाना की इन्द्रा देवी इंदौरिया ने सीमा सन्देश को बताया कि सन् 2009 में गंगानगर से गांव लौटते समय एक सड़क दुर्घटना में लोगों को बचाते हुए इकलौता बेटा मौत का शिकार हो गया था।  उसी दिन से मैने ठान ली की,आज के बाद किसी मां का लाल सड़क हादसे में जान न गंवाए। अब चाहे आंधी हो,गर्मी-सर्दी,रात-दिन हर समय उपचार पेटी साथ रखती हूं। जहां भी किसी को मदद की जरूरत पड़े तो हाजिर रहती हूँ । 

लेखक -- जयलाल वर्मा एक पत्रकार हैं

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