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Monday, 18 March 2019

Jodhpur - दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'हाशिए का साहित्य,समाज और संस्कृति' का समापन समारोह किया गया आयोजित


जोधपुर(किरण राजपुरोहित) जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'हाशिए का साहित्य, समाज और संस्कृति' का कल गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में समापन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर अपना अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर के पूर्व कुलपति प्रो. के. डी. स्वामी ने कहा कि किसी समाज को हाशिए पर धकेलने के लिए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक कारण जिम्मेदार हैं। जब तक हम इन्हें संवैधानिक संरक्षण देकर उचित प्रतिनिधित्व नहीं देंगे तब तक यह समाज मुख्यधारा में नहीं आएगा। अतः मुख्यधारा के समाज को अपनी मानसिकता में बदलाव करने की जरूरत है। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. आशिक अली ने कहा कि हमें संकीर्णताओं से दूर हटकर हाशिए के लोगों को मुख्यधारा में पहचान देने के लिए आगे लाना होगा। हमारी संस्कृति गंगा-जमुनी संस्कृति है। अतः हिंदू-मुस्लिम का अंतराल खत्म करना होगा। विशिष्ट अतिथि के रुप में बोलते हुए पत्रकार भंवर मेघवंशी ने कहा कि हाशिए के लोगों की समस्याएं व्यापक है।

 कई समाजों के पास न रहने को घर है और न ही स्थाई रोजगार। अतः इन्हें मुख्यधारा में जोड़ने के लिए उनका पुनर्वास जरूरी है। इसी प्रकार मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए नगर निगम में अपर पुलिस अधीक्षक सीमा हिंगोनिया ने हाशिए के लोगों के कानून संरक्षण संबंधी विभिन्न कानूनों की जानकारी दी। प्रारंभ में बाबा साहब के चित्र पर माल्यार्पण किया गया तथा विभागाध्यक्ष प्रो. कैलाश कौशल ने मंचासीन अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी संयोजक डॉ. प्रवीण चंद ने दो दिवसीय संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। अंत में हिंदी विभाग के प्रो. किशोरी लाल रैगर ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा इतिहास विभाग के डॉ. ललित कुमार ने मंच संचालन किया। 



इससे पूर्व दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। तृतीय तकनीकी सत्र 'पहचान को तरसता, जमीन बिछाता, आसमान ओढ़ता समाज' पर केंद्रित था। जिसमें अल्पसंख्यक, खानाबदोश समाज, साहित्य पर विचार रखे गए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. छोटाराम कुम्हार ने की तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. मेराज अहमद मुख्य अतिथि थे।  विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध कथाकार हबीब कैफी व मुख्य वक्ता डॉ. बलराम कांवट थे। 

 चतुर्थ तकनीकी सत्र 'अस्मिता के लिए संघर्षरत व जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्षरत समाज' पर था जिसमें दलित और आदिवासी साहित्य व समाज पर विचार प्रकट किए गए। 

इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. श्रवण कुमार मीणा ने की तथा मुख्य अतिथि बूंदी के डॉ. रमेश मीणा थे। विशिष्ट अतिथि हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. अरविंद सिंह तेजावत थे। मुख्य वक्ता डॉ. गोपी किशन चितारा थे। दोनों तकनीकी सत्रों में भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालय से आए शोध छात्रों एवं शिक्षकों ने अपने पत्रवाचन कर हाशिए के समाज, साहित्य व संस्कृति का निरूपण किया।


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